ANMOL VACHAN OF KABIR JI-www.santrampaljiamaharaj.com

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 में आप सभी से वो बात बताने जा रहा हूँ। जीवन में जो हम जानते तो है लेकिन मानते नही मनुष्य जीवन में हम सभी सुखो की अपेक्षा करमो से अधिक करते  लेकिन जब जीवन की सचाई [दुःख] सामने आता है। तो हम समझ नही पाते हे की हमने ऐसा क्या और कब किया था की जो हमारे साथ ऐसा हो रहा है। जीवन में दुःख आने का क्या कारन है। 
BEST-VACHAN-KABIr-PARMESHWAR-dohe-images-photo-picture-pic-img-wallpepar-santrampalji आइये समझते है = जब हमारा जन्म होता है, धर्म कि शुरुआत वही से होती है।कुछ समझने लगते है। तभी से हमें हमारे बुजुर्गो  द्वारा बताये गए धर्म की जानकारी होती है।धर्म क्या है। हमें समझमे आता है। सभी धर्मो के लोगो के साथ यही होता है। और सभी अपनी साधना भगति इबादत को सर्व श्रेष्ठ मानते है।लेकिन जो हमारे धर्म ग्रन्थ किताब  में जो लिखा है।अगर हम उनके अनुसार चलते हे तो जीवन में दुःख आना सम्भव ही नही \लेकिन हम मौखिक अर्थात हमें हमारे लोगो जो अपने है। उनके द्वारा बताए गए रास्ते पर चल पड़ते है।  कभी हमने धर्म ग्रन्थ की जानकारी लेने की कोशिस भी नही की जिस कारण हमसे अनजाने में वो कर्म हो रहा है। जो हमारे पूर्वज  और हमारी पीढ़ी को अत्यन्त दुःख के मार्ग पर चलने पर मजबूर कर रही है। 

 उपवास =हिन्दू धर्म में उपवास को अधिक महत्त्व दिया जाता है। और अनगिनत लोग कई तरह के उपवास कर रहे हे कभी किसी ने ये नहीं सोचा कि जो वो साधना कर रहे है वह लाभ दायक है भी या नही जिस ने जैसा बताया करने लगे \ जबकि हिन्दू धर्म के किसीभी ग्रन्थ में नही लिखा है कि उपवास करना चाहिए \आप सभी ने एक बात तो सुनी होगी। आत्मा सौ परमात्मा, जब भूखे रहने से आत्मा को कष्ट होता है। तो परमात्मा को अधिक कष्ट होता हे। और हम समझते है। की हम उपवास कर के पुण्य  प्राप्त कर रहे है। लेकिन प्राप्ति तो दुखो की हो रही है।

दैत्यभोग =सतयुग में कोई भी मनुष्य मास और शराब आहार नही करता था।  केवल असुर, दैत्य ,राक्षस हि मॉस आहार करते थे।  आज की कुरीतियो में जीवो की बलि और शराब का प्रयोग किया जाता है। जो सरासर गलत है। और मॉस आहार करना जीव हत्या[पाप ] का भागीदार बनाता है। और जिसकारन  जीवन में हमें तकलीफ दुःखो आपदाओ  का सामना करना पड़ता है। 
पूजा  = अक्सर लोगो  के द्वारा दी गई पूजा को सही मानते है लेकिन कभी ये जानने की कोशिस नही की क्या जो हम कर रहे हे वो पूजा सही है.,पता करने के लिए हमारे शास्त्रो वेदों पुराणों की मदत लेनी चाहिए  हिंदुस्तान में मौखिक कथाओ पूजाओं का अधिक चलन है। जिस से कोई लाभ प्राप्ति नही होती है। 
आर्शीवाद = हिंदुस्तान में पैर छूने का पुराना  प्रचलन है। अगर बुजुर्गो के पैर न छुओ तो अपमान माना जाता है। लेकिन कभी किसीने ये सोचा की  आर्शीवाद देने का अधिकार है भी, आर्शीवाद देने क अधिकार सिर्फ देवी, देवता, परमात्मा,और पुरण संत को ही प्राप्त है। आप किसी को आशीर्वाद देते है तो आप के पुण्य खत्म होते है।और किसी मनुष्य काआशिर्वाद लेने से जरुरी नही की उसके पास पुण्यों की पूंजी हो  अगर  पाप रूपी पूंजी उसके पास हे और आप उसका आशिर्वाद लेते है। तो आप के जीवन में सुख सीमा का आकर छोटा हो जाता है और दुःख की  सीमा का आकर और अधिक बड़ जाता है। 
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 दान = किसी असहाय पर दया का भाव  हम लोगो के मन में कोई संकोच किये बिना आता है मदत कर के दान देकर हम समझते है।  की हमारे पुण्य हमारे कर्म बड़ रहे है। लेकिन कलयुग में पुण्य प्राप्त करना इतना आसान भी नही है मान लीजिये आप ने एक भिकारी को भिक में रूपये दिए और वो उन रुपयो शराब पीकर अपनी पत्नी बच्चे को मरता है उनकी आत्मा दुखाने का जो पाप वो कमा रहा है उस पाप के हिस्सेदार आप भी बन रहे है। और अगर वो भिकारी नशे में बीबी या बच्चे की जान ले लेता है ,तो आप भी उनकी मोत  के जिम्मेदार है। 
अगर आप दान करना चाहते है। तो आप किसी भूखे को[मनुष्य -पशु -पक्षी ] को भोजन करादे यही सही दान है। 
भक्ति = सभी महापुरुष उस एक परमात्मा। की तरफ इशारा कर गए हे लेकिन हम परमात्मा को छोड़ उस महापुरुष की पूजा करने लगे।हम समझ नही पाए की देवी देवता ,और भगवन[परमात्मा ] में क्या अंतर है। देवी देवता आप को आपके कर्मो से अधिक लाभ नही दे सकते,जो आप ने कर्म किया है। उसे आप को भोगना ही पड़ेगा। आप इनकी जो साधना कर रहे है। वे आपको मोक्ष प्राप्त नही करा सकती । मनुष्य जीवन ८४ लाख योनि के बाद मोक्ष प्राप्ति के लिए होता है। और हम सांसारिक सुखो को विलासिताओं को पूरा करने में अनमोल समय नष्ट कर रहे है। सभी धर्म ग्रंथो  में उस परमात्मा की भगति का उल्लेख किया हुआ है .  

श्लोक= कबीर ,गुरु बिन माला फेरते गुरु बिन देते दान
              गुरु बिन दोनों निष्फल है। पूछो वेद पुराण। 
अर्थ =   कबीर जी कहते है।वेद पुराण में लिखा है.की जो व्यक्ति किसी संत [पूर्ण गुरु ] का शिष्य नही है वो अगर दान देकर ,माला फेरकर ये समझते है की उसे कोई फल प्राप्त होगा तो ये उनकी भुल है।
     









 
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