श्री कृष्ण ने भी पितरो [भूतो ]तथा देवी देवताओ की पूजा का मना किया है-www.santrampaljiamaharaj.com



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तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।                  तत्प्रसादात्परां शांति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम।६२
www.santrampaljimaharaj.com श्री कृष्ण ने भी पितरो [भूतो ]तथा देवी देवताओ की पूजा मना किया है। इसलिए उन्होंने देवताओ के राजा इंद्र की पूजा बंद करा दी जिसके लिए गोवर्धन पर्वत उठाया तथा इंद्र को सबक सिखया।
गीता जी अध्याय नम्बर 9 के श्लोक नम्बर 25 में लिखा हे कि -

                     यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
                      भूतानि यान्ति भुतेज्या यान्ति मधाजिनोSपि माम। २५

अनुवाद =देवताओ को पूजने वाले देवताओ को प्राप्त होते है।  पितरोको पूजने वाले पितरो को प्राप्त होते है।  भूतो पूजनेवाले भूतोको प्राप्त होते है।और मतानुसार पूजन करनेवाले भक्त मुझसे ही लाभान्वित होते है।



                  यतः  प्रव्रत्तिर्भूतानां  येन सर्वमिदं ततम। च्च
                    स्वकर्मणा तम्भ्ययच्र्य सिद्धि विन्दति मानवः।४६


अनुवाद =जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है ,उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मो द्वारा पुजा कर के मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता हैं। 46


                    तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
                    तत्प्रसादात्परां शांति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम।६२

 अनुवाद =हे अर्जुन। तू सर्वभाव से उस ईश्वर की शरण में चला जा। उसकी कृपासे तू परम शान्ति को और अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाएगा।
 सर्वभाव का तात्पर्य हे की कोई अन्य पूजा न करके मन -कर्म-वचन से एक ईश्वर में आस्था रखना।

            पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्ययस्त्वनन्यया।
            यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन स्रवमिंद ततम। २२।

 अनुवाद =हे प्र्थानंद अर्जुन। सम्पूर्ण प्राणी जिसके अंतर्गत हे और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त हे,वह परम् पुरुष परमात्मा तो अनन्य भक्ति  से प्राप्त होने योग्य है।
                                                                              अनन्यभक्ति का तात्पर्य हे एक परमेश्वर [पूर्ण ब्रह्म ]की भक्ति करना ,दूसरे देवी-देवताओ अर्थात तीनो गुण [रजगुण-ब्रह्म ,सतगुण-विष्णु ,तमगुण -शिव] की नहीं
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